जिनकी आँखों से भयभीत होकर,
शब्द समझना सिखा है
हर एक तथ्य का मोल परख कर
मनं के पन्नो पर रखा है
उन शिक्षाप्रद गुरुजनों के
मेरे बोल है आभारी
जिन अबोध पलों को जी जी कर
गिर कर संभालना सिखा है
हर एक वाकया पी पी कर
कौशल्य का पौधा सींचा है
जीवन रुपी उन अनुभवो के
मेरे बोल है आभारी
कुछ पने की अपेक्षा मे
सब खोने का सन्ताप नहीं
जीत जाने की होड़ में
मर जाने का आलाप नहीं
सर पे सवार जुनूनो से
मैंने लक्ष्य बनाना सिखा है
दिन रात पनपते सपनो के
मेरे बोल है आभारी
त्याग से प्रेम का रिश्ता
सही-गलत ,सम्मान और परोपकार
हर एक डोर से बंध कर
सीमा में उड़ना सिखा है
रिश्तों से मिले संस्कारों के
मेरे बोल है आभारी
तबीयत हरी करती हरियाली
सौंदर्य झलकती सृष्टि
मिलकर सब प्रमाणित करते इश्वर की कलाकारी
रात पिलाती चांदनी-रस ,चाँद सितारे ओढ़े
सिकुड़ी धरती पे करता नभ प्रेम-वर्षा
जाड़े की सुबह में खिलता यौवन पुष्पों का
हर होती क्रिया कारणवश और समयसर जहाँ
ऐसे अलौकिक जगत से ह्रदय में
रोमांच का झरना फूटा है,
प्रकृति से मिलते प्रोत्साहन के
मेरे बोल है आभारी
जो अश्रु बनकर टपकते है
कभी हसी से अधरों पे चिपकते है.
जिव्हा-सिल्पत्ते से फिसलते है
कभी दिल ही दिल में उलझते है,
मेरे अंतर मनोभावों के मेरे बोल है आभारी
यादों से भरी झोली को
जो खोलकर कभी बेठी मैं
लघु-क्षणों के कितने अश्रु,
कितने ठहाके मिले मुझे
आते-जाते बंजारों से मैंने घुलना-मिलना सिखा है
उन खट्टे-मीठे चार पलों के मेरे बोल है आभारी